Mon12112017

Last updateMon, 13 Nov 2017 4am

Who are the Hindus?

 Who are the hindus

If one has to write a new history of India, one has to start with the right foundations and set the record straight. Thus the first task is to demystify the word ‘Hindu’ about which there is so much misunderstanding…

Let’s say it right away: there are no Hindus… This word was invented by European colonizers to designate a people which lived in the valley of the Indus. The exact appellation should be “Indu”, a term which was actually used for centuries by outsiders, to name all India’s inhabitants, be they Muslims, Christians, Buddhists or Hindus. But when Indus became Hindus at the hands of western colonizers, it grew to be a source of confusion and had catastrophic consequences for Indian history: it brought indirectly the terrible partition of the subcontinent and is partly responsible today for the inter-religious strife in India.

Who are the Hindus then – or shall we say Indus? Western (and unfortunately also Indian) historians have often reduced Hinduism to a code of moral conduct and a set of rites and rituals,

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Nine Ways To Stop Conversions

Nine Ways To Stop Conversions

Thanks to “Ghar Vapasi” programs, the issue of conversions is in the news again. Unfortunately, no one seems to be going into the cause of conversions. Unless these are addressed, protests about conversions will influence only TRPs of TV channels

One: Money Power!

NGOs receive large contributions from foreign entities. These contributions from abroad are governed by the Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) which requires the recipients to get prior approval from the Home Ministry (HM). The recipients could be religious, social, educational, cultural or educational organisations. The NGO has to annually submit audited accounts to HM who collate accounts to present the FCRA Annual Report. HM does a detailed check of randomly picked associations. The last available report is for the year 2011–12. Here are some key data:

  • There are approx. 42,000 registered NGO’s.
  • Over 80% of top 15 donor and recipient organizations are Christian, ironically in a country where roughly 80% of the population is Hindu. 
  • 148 organizations received more than Rs 10 crs (99 in 2005-06).
  • Between 1993-94 to 2011-12 NGOs received Rs 1,16,073 crs.

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वामपंथी इतिहासकारों ने भारत के रक्तरंजित इतिहास को अपनी स्याह स्याही से ढक दिया!

वमपथ इतहसकर न भरत क रकतरजत

भारत उसकी संस्कृति और अकूत धन सम्पदा ने वर्षों से विदेशी आक्रांतों को भारत में आक्रमण के लिए प्रेरित किया। यूनान, तुर्क, अरब से आये विदेशी हमलावरों ने न केवल भारत की संस्कृति, वैभव और सम्पदा को लूटा बल्कि करोड़ों लोगों का नरसंहार भी किया। भारत की धरती को रक्तरंजित करने और गौरवशाली इतिहास को जितना तहस नहस मुस्लिम आक्रमणकारियों और मुग़ल साम्राज्य ने किया उतना शायद किसी ने नहीं किया! लेकिन भारत का दुर्भाग्य मानिये कि यहाँ के वामपंथी इतिहासकारोंऔर बुद्धिजीवियों ने भारत के रक्तरंजित इतिहास में आक्रांताओं और मुगलों की रक्तलोलुपता को अपनी स्याह स्याही से ढक दिया!

जानिये किस किस के आक्रमण और शासन काल में भारत में कितना रक्तपात हुआ :

महमूदग़ज़नवी:-वर्ष 997 से 1030 तक बीस लाख लोगों को महमूद ग़ज़नवी ने क़त्ल किया और सात लाख पचास हज़ार लोगों को गुलाम बनाकर भारत से ले गया था, भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा(१७) बार भारत में आक्रमण के दौरान जिन्होंने भी इस्लाम कबूल कर लिया उन्हें शूद्र बना कर इस्लाम में शामिल कर लिया गया, इनमे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तो थे ही!

कुतुबुद्दीनऐबक:-(वर्ष 1206 से 1210 ) सिर्फ चार साल में बीस हजार भारतीय गुलाम राजा भीम से लिए और पचास हजार गुलाम कालिंजर के राजा से लिए थे जिन्होंने उनकी दासता स्वीकर नहीं की उनकी बस्तियों की बस्तियां उजाड़ दीं। गुलामों की अधिकता का यह आलम था की कि “गरीब से गरीब मुसलमान के पास भी सैंकड़ों हिन्दू गुलाम हुआ करते थे।”

इल्तुतमिश:-(वर्ष 1211-1236) इल्तुतमिश को जो भी मिलता था उसे गुलाम बना कर, उस पर इस्लाम थोप देता।

बलबन:-(1250-1260) ने राजाज्ञा निकाल दी थी कि 8 वर्ष से ऊपर का कोई भी आदमी मिले उसे मौत के घाट उतार दो। महिलाओं और लड़कियों वो गुलाम बना लिया करता था,बलबन ने भी शहर के शहर खाली कर दिए। 

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माक्सवादी इतिहासकारों और अन्य बुद्धिजीवियों की जुगलबंदी ने जान बूझ कर अटकाया है राम मंदिर की राह में रोड़ा!

मकसवद इतहसकर और अनय बदधजवय

फिलहाल यह कहना कठिन है कि अयोध्या मसले को आपसी बातचीत से सुलझाने की कोई कोशिश होगी या नहीं, लेकिन यह स्पष्ट है कि जब भी ऐसी कोई बातचीत होगी तो कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक महत्व के साक्ष्यों की अनदेखी नहीं की जा सकेगी। पुरातात्विक महत्व के कुछ साक्ष्यों की चर्चा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक केके मुहम्मद ने मलयालम में लिखी अपनी आत्मकथा-‘न्यांन एन्ना भारतियन’ यानी ‘मैं एक भारतीय’ में की है। जनवरी, 2016 में आई इस किताब को लिखने वाले मुहम्मद का गहरा नाता 1976-77 में अयोध्या में हुए उत्खनन और अध्ययन से रहा है। वह प्रोफेसर बीबी लाल की अगुआई वाले उस पुरातत्व दल के सदस्य थे जिसने दो महीने वहां उत्खनन किया था। इस दल को वहां पहले अस्तित्व में रहे मंदिर के अवशेष दिखे और उनसे यह स्पष्ट हुआ कि बाबरी मस्जिद का निर्माण मंदिर की अवशेष सामग्री से ही हुआ था।

केके मुहम्मद ने लिखा है, ‘हमने देखा कि बाबरी मस्जिद की दीवारों पर मंदिर के स्तंभ थे। ये स्तंभ काले पत्थरों से बने थे। स्तंभों के निचले भाग पर पूर्णकलशम जैसी आकृतियां मिलीं, जो 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में नजर आती थीं। वहां ऐसे एकाध नहीं, बल्कि 1992 में मस्जिद विध्वंस के पहले तक 14 स्तंभ मौजूद थे। चूंकि उस जगह पुलिस की सख्त पहरेदारी थी, लिहाजा हर किसी को जाने की आजादी नहीं थी, लेकिन शोध समूह का हिस्सा होने के नाते हमें कोई मनाही नहीं थी। यही वजह है कि हमारे लिए उन स्तंभों का सूक्ष्म अवलोकन करना संभव हुआ।’ केके मुहम्मद के अनुसार, “मस्जिद के पीछे और किनारे वाले हिस्सों में एक चबूतरा भी मिला जो काले बसाल्ट पत्थरों का बना था। इन साक्ष्यों के आधार पर दिसंबर, 1990 में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वहां असल में एक मंदिर ही था। तब तक यह ज्वलंत मुद्दा बन गया था, फिर भी तमाम उदारवादी मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद को हिंदुओं को सौंपने पर रजामंदी जताई, लेकिन उनमें सार्वजनिक रूप से ऐसा कहने की हिम्मत नहीं थी। मुहम्मद कहते हैं कि अगर तब बात आगे बढ़ती तो अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो सकता था। मुश्किल यह हुई कि इस विवाद में वामपंथी इतिहासकार कूद पड़े और उन्होंने उन मुसलमानों के पक्ष में दलीलें पेश कीं जो विवादित स्थल को हिंदुओं को सौंपने के हक में नहीं थे।”

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Why Christianity Poses A Clear Threat To India

Why Christianity Poses A Clear Threat To India

If you could sum up the history of Christianity in India in one word, that word would be ingratitude. Among the earliest refugees to arrive in India were the Syrian Christians, who were facing persecution in their native lands in the Persian Empire in the fourth century CE.

Persecution would be the wrong word to use here because the Syrian Christians of the Persian Empire were found to be collaborating with Christianised Rome. Aghast at the betrayal by his Christian subjects – in the midst of Persia’s war with the Romans – the Zoroastrian king Shapur II lamented: “We are in a state of war; they are in a state of joy and pleasure. They live in our land but are of like mind with the emperor, our enemy.”

Shahpur II deported some Christians from his Eastern Syrian province and imposed a double tax on those that remained. The Christian subjects were then ordered to revert to their native Zoroastrian religion.

Down on their luck, the Syrian Christians sought refuge in India. Kerala’s Malabar coast attracted them because they had heard of an ancient community of Jews who had been living there since the first century CE, having also fled the turmoil of the Middle East.

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India and Sanskrit: The Source of World Literature

India and Sanskrit- The Source of World Literature

Sanskrit, if it is the original language since the creation, is also the source of world literature. Laura Elizabeth Poor observes in her book, Sanskrit and Its Kindred Literature-Studies in Comparative Mythology, “I propose to write about the literature of different nations and different centuries. I wish to show that this literature is not many but one; that the same leading ideas have arisen at epochs apparently separated from each other; that each nation however isolated it may seem, is, in reality, a link in the great chain of development of the human mind; in other words to show the unity and continuity of literature…”

“The histories of Phoenicians, Cartheginians, Romans or Greeks, were so many detached pieces of information…But the moment the mind realizes…that one nation is connected with all others, its history becomes delightful and inspiring…And it is to the Sanskrit language that we owe this entire change…Sanskrit was a spoken language at the of Solomon, 1015 B.C., also of Alexander, 324 B.C.”

In this same line of thought, it has been determined that the Sanskrit Rig-Veda is the oldest piece of literature in the world. Reverend Morris Philip,

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पढ़ना मत! अपनी मूर्खता को पकड़े रखना- कश्‍मीरी पंडित के पूर्वजों ने मूर्खता की थी, उनकी अगली पीढ़ी गाजर-मूली की तरह काट दी गयी, भगा दी गयी! ‎

पढन मत अपन मरखत क पकड रखन

हिंदुओं में एक विचित्र बात है, वह अपने इतिहास से सबक लेने को तैयार ही नहीं है! और ऐसा नहीं कि यह आज की बात हो, यह हमारे पूर्वजों से चली आ रही मूढ़ता है, जिसका खामियाजा इस बेहद खूबसूरत देश को बार-बार भुगतना पड़ा है। अब कल मैंने 1946 के चुनावी परिणाम के आधार पर बताया था कि आज भारत में जो मुसलमान हैं, उनमें से 90 फीसदी के पूर्वजों ने पाकिस्‍तान निर्माण के पक्ष में मतदान किया था और उन्‍हीं के वंशज आज आतंकी याकूब मेनन के लिए सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक पर उतरे हुए हैं। यह आधुनिक भारत का ऐतिहासिक तथ्‍य है। लेकिन कुछ मूढमति इसे मानने को भी राजी नहीं हैं! मेरा बस इतना आग्रह है कि कम से कम मुझे गलत साबित करने के लिए ही सही, लेकिन इतिहास की पुस्‍तक हाथ में तो पकड़ लो!

एक दूसरी प्रजाति के मूढमति हैं, जो कहते हैं कि इतिहास को पुस्‍तक में ही बंद रहने दो, बाहर निकालने पर नफरत फैल जाएगी। वो यह नहीं समझ पा रहे हैं कि एक बार इनसे इनके बाप का नाम छीन लिया गया तो ये 'हरामी' की श्रेणी में आ जाएंगे! अंग्रेजों व वामपंथियों ने यही किया। भारत से उसका मूल इतिहास छीन लिया, जिसके कारण ऐसे 'हरामी' सोच वाले लोग आज मौजूद हैं। वैसे भी अंग्रेज व वामपंथी ने तो तुम्‍हें विदेशी आर्यन्‍स कहा ही है, अर्थात हरामी। कम से कम सही इतिहास से तुम उन्‍हें तो झूठ साबित कर पाओगे या फिर हरामी रहने में ही सुख मिल रहा है? मित्रों से क्षमा मांगता हूं, लेकिन मुझे ऐसे दोगलों के लिए यह शब्‍द लिखना पड़ रहा है।

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