Sat11182017

Last updateMon, 13 Nov 2017 4am

मैं आज़ाद हूँ

2-27-15 chander shekhar death day

भारत को स्वतन्त्र कराने वाले जिन महापुरुषों का नाम इतिहास के पन्नो पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है उन्ही में से एक है महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद।

चंद्रशेखर आजाद एक गरीब परिवार में जन्में थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के झबुआ तहसील के भावरा नामक गाँव में 23 जुलाई 1906 को हुआ था। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। सीताराम तिवारी उन्नाव जिले के बदरका नामक गाँव के निवासी थे। पर उन्हें अपने परिवार का पेट पालने के लिए भावरा ग्राम जाना पड़ा। वहाँ वे एक बगीचे की देखभाल करते थे और तनख्वाह में आठ रुपया माहवार मिलता था। इतने कम वेतन में ही उन्हें किसी प्रकार जीवन गुजारना पड़ता था।

गरीबी का बचपन :
इस प्रकार चंद्रशेखर आजाद का बचपन बड़ी गरीबी में बीता। लेकिन वे बड़े साहसी थे। पिता चाहते थे कि चंद्रशेखर किसी छोटी -मोटी नौकरी में लगकर परिवार की सहायता करें। परन्तु वे इसके लिए तैयार नहीं हुए और सबकुछ छोड़ कर बम्बई जा पँहुचे। पेट पालने के लिए वहाँ उन्होंने कुछ दिन मजदूरी भी की। परन्तु चंद्रशेखर तो किसी बड़े काम के लिए पैदा हुए थे। वे बम्बई से वाराणसी आये और संस्कृत पाठशाला में भर्ती हो गये। यहाँ भोजन और निःशुल्क संस्कृत शिक्षा , कुछ दिन यही सिलसिला चला। पर उनका मन संस्कृत पढ़ने में कम लगता था। उन्हें क्रान्तिकारियों के रोमांचक किस्से पढ़ने में असीम आनंद प्राप्त होता था।

बेंत की सजा :
1921 ई. में भारत स्वतन्त्र नहीं था। परन्तु भारतवासी अब अंग्रेजों का शासन स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। अंग्रेज सरकार को हटाने के लिए गाँधी जी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन आरम्भ हुआ। तेरह -चौदह साल के चंद्रशेखर भी इस आन्दोलन में कूद पड़े। संस्कृत पढ़ने वाले दस बारह लड़कों के साथ जुलूस निकाले और विदेशी वस्त्रों तथा शराब की दुकानों पर धरना देने लगे। इस पर चंद्रशेखर गिरफ्तार कर लिये गये। पारसी मजिस्ट्रेट के सामने पेशी हुई।

मजिस्ट्रेट ने कड़े स्वर में सवाल किया -'तुम्हारा नाम क्या है ?'
बालक ने निडरता से जवाब दिया - 'आजाद।'

मजिस्ट्रेट ने फिर पूछा - 'तुम्हारे बाप का नाम क्या है ?'
चंद्रशेखर ने उत्तर दिया - 'स्वाधीन।'

मजिस्ट्रेट का अगला प्रश्न था -'तुम्हारा घर कहाँ है ?'
बालक ने उसी तरह तपाक से उत्तर दिया -'जेलखाना।'

चंद्रशेखर के इस प्रकार के उत्तरों से मजिस्ट्रेट चिढ गया और उसने उन्हें पन्द्रह बेंत लगाकर छोड़ देने का आदेश दिया।
जेल के अंदर यह चंद्रशेखर ने बिना उफ़ किये और हर बेंत पर महात्मा गाँधी की जय कहते हुए सहन की। उनका शरीर खून से लथपथ हो गया था। तन की चमड़ी कई जगह से उधड़ चुकी थी। अब वे चन्द्रशेखर से चन्द्रशेखर आजाद बन चुके थे। जेल से छूटने पर वाराणसी में एक सार्वजानिक सभा में उनका सम्मान किया गया था। स्वस्थ होने पर वे काशी विद्यापीठ में भर्ती हो गये।

क्रान्तिकारी :
उन दिनों क्रान्तिकारी आन्दोलन भी जारी था। क्रान्तिकारी मानते थे कि बिना बल के अंग्रेजों को भारत से बाहर नहीं खदेड़ा जा सकता था। वाराणसी उस समय क्रांतिकारियों का गढ़ था। आजाद का उनसे सम्पर्क हुआ। इस बीच गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था। अब क्रान्तिकारी अपने ढंग से विदेशी सरकार के विरुद्ध और तेजी से काम करने लगे थे। साहसी आजाद हर काम में आगे रहते थे। उन्होंने क्रान्तिकारियों का एक बहुत बड़ा संगठन खड़ा किया। इसका नाम हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी रखा गया। चन्द्रशेखर इसके प्रधान सेनापति थे। उनके सहयोगियों में सरदार भगत सिंह, शिवराम , राजगुरु , बटुकेश्वर और सुखदेव जैसे लोग थे।

महन्त के चेले :
क्रान्तिकारियो को हथियार खरीदने तथा अन्य कामों के लिए धन की आवश्यकता पड़ती थी। एक बार पता चला कि गाजीपुर का एक धनी महन्त बीमार है और वह अपनी गद्दी के लिए चेले खोज रहा है। क्रान्तिकारियो की ओर से आजाद नाम बदल कर उसके चेले बन गये। लेकिन जब देखा कि महन्त के जल्दी मरने की और उसकी सम्पति क्रान्तिकारियो के हाथ लगने की सम्भावना नहीं है , तो वे वापस वहाँ से आ गये।

काकोरी की घटना :
धनाभाव की समस्या हल करने के लिए क्रान्तिकारियो ने 9 अगस्त 1925 को उत्तर प्रदेश में काकोरी स्टेशन से गुजर रही ट्रेन को रोक कर अंग्रेजी सरकार का खजाना लूट लिया। चन्द्रशेखर आजाद भी उसमें सम्मिलित थे। इस घटना के बाद बड़ी धर पकड़ हुई। अनेक क्रान्तिकारी पकड़े गये। उन पर मुकदमा चला। इस मुक़दमे में राम प्रसाद बिस्मिल ,अशफाक उल्ला खान,राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फाँसी की सजा हुई। अनेक लोगों को लम्बी कैद हुई। किन्तु चन्द्रशेखर आजाद फरार हो गये और ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार न कर सकी।

लाला जी की मौत का बदला :
1928 ई. में अंग्रेजों ने एक 'साइमन कमीशन भारत भेजा' , इसका विरोध कर रहे पंजाब के वयोवृद्ध नेता लाला लाजपत राय को बुरी तरह लाठियों से पीटा गया। इससे कुछ दिन बाद उनका देहान्त हो गया। इस घटना से देश में बड़ी उतेजना फैली। चन्द्रशेखर आजाद और उनके साथियों ने लाला जी की हत्या का बदला लेने का फैसला किया। उन्होंने 17 सितम्बर 1928 ई. को पुलिस ऑफिसर साण्डर्स को गोली मार दी। उस समय ब्रिटिश पुलिस किसी भी क्रान्तिकारी को गिरफ्तार नहीं कर सकी।

एसेम्बली में बम :
उन्ही दिनों अंग्रेज सरकार ने भारतवासियों का दमन करने के लिए केंद्रीय असेम्बली में दो बिल पेश किये। इन बिलों के विरोध में आवाज उठाने के लिए चन्द्रशेखर आजाद और उनकी पार्टी ने एक योजना बनाई। इस योजना के अनुसार 7 अप्रैल 1929 ई. को सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय असेम्बली में एक शक्तिशाली बम फेंका। बम फेंक कर वे लोग वहाँ से भागे नहीं, बल्कि अंग्रेज सरकार के खिलाफ नारे लगाते रहे। उन दोनों को वहीं पर गिरफ्तार कर लिया गया। योजना बनाने वाले चन्द्रशेखर आजाद को पुलिस इस बार भी गिरफ्तार न कर सकी।

ब्रह्मचारी के वेश में :
बहुत से क्रांतिकारी काकोरी काण्ड में गिरफ्तार हो चुके थे। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ़्तारी से चन्द्रशेखर आजाद अकेले रह गये। लेकिन उन्होंने अंग्रेजों की पुलिस की आँखों में धूल झोंकते हुए फिर से क्रान्तिकारियो का संगठन बनाना आरम्भ कर किया। वेश बदलने में बड़े कुशल थे। फरारी के दिनों में लम्बे समय तक झांसी और ओरछा दे बीच सतार नदी के किनारे ब्रम्हचारी बन कर रहे। उन्होंने अपना नाम हरिशंकर रख लिया था। यों दल में उनका नाम बलराज था। क्रान्तिकारी अपना असली नाम नहीं लेते थे। यहां क्रान्तिकारी साथी भक्त के रूप में उनके पास बिना किसी कठिनाई के पँहुच जाते थे।

शहीद :
संगठन के काम से आजाद इलाहबाद पँहुचे। उनके साथ सुखदेव भी थे। कहते है क्रन्तिकारी दल का कुछ रुपया एक व्यक्ति के पास रखा था। आजाद उसी को लेने के लिए वहाँ गये। एक गद्दार ने उनके साथ विश्वासघात किया। उसने आजाद के अल्फ्रेंड पार्क में होने की सूचना पुलिस को दे दी। उसके बाद जो कुछ हुआ उसका वर्णन आजाद की जीवनी के एक लेखक ने इन शब्दों में किया है।

जैसे ही अंग्रेज पुलिस अफसर नाट बाबर ने हाथ में पिस्तौल लिए हुए पार्क में घुस कर आजाद को ललकारा - तुम कौन हो ? यहाँ क्या कर रहे हो ? साथ ही उसने गोली भी चला दी। आजाद ने भी पिस्तौल निकाल कर उसकी गोली का उत्तर गोली से दे दिया। नाट बाबर की गोली आजाद की जांघ में लगी। आजाद की गोली नाट बाबर के पिस्तौल वाले हाथ में लगी और पिस्तौल उसके हाथ से जमीन पर गिर गया। नाट बाबर ने आजाद की गोली से बचने के लिये पास ही एक नाले में कूद कर मौलसिरी के पेड़ की आड़ ले ली। आजाद ने सुखदेव को भाग निकलने का आदेश दिया और स्वयं पुलिस का सामना करने के लिए जामुन के पेड़ की आड़ में खड़े हो गये।

इतने में ही डी. वी. एस. पी. विश्वेश्वर सिंह ने पुलिस दल के साथ आजाद को घेर लिया। दोनों ओर से गोलियाँ चलने लगी। इसी बीच विश्वेश्वर सिंह ने आजाद के लिये कुछ अपशब्दों का प्रयोग किया। इस पर आजाद बोले अच्छा तो इसका प्रसाद तुम भी ले लो और ऐसा निशाना लगाया की गोली जाकर उसके जबड़े में लगी। फिर वह जिंदगी भर ठोस अन्न नहीं खा सका।

आधे घंटे तक दर्जनों पुलिस वालों की गोलियों के साथ जूझते हुए अंत में आजाद 27 फरवरी 1931 को शहीद हो गए। यह पार्क अब चन्द्रशेखर आज़ाद पार्क के नाम से प्रसिद्ध है।
अंग्रेजो ने आजाद का शव अन्तिम संस्कार के लिये जनता को नहीं दिया। यही नहीं, जिस पेड़ की आड़ उन्होंने ली थी, उसे भी कटवा दिया। परन्तु अमर बलिदानी चन्द्रशेखर की याद भारतवासियों के हृदय में सदा बनी रहेगी और उनकी देशभक्ति और बलिदान से लोग प्रेरणा लेते रहेंगे।

 Published: Feb 27, 2015

comments